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धान में पत्तियों का पीलापन: कारण, पहचान और सही उपचार

धान में पत्तियों का पीलापन: कारण, पहचान और सही उपचार

धान में पत्तियों का पीलापन: कारण, पहचान और सही उपचार

धान की पत्तियों का पीला होना केवल यूरिया की कमी का संकेत नहीं है। नाइट्रोजन या जिंक की कमी, खेत में अधिक पानी, खराब जड़ें, कीटों का प्रकोप, टुंग्रो रोग, जीवाणु झुलसा और गलत खरपतवारनाशक प्रयोग जैसे कई कारणों से धान पीला दिखाई दे सकता है।

बिना कारण पहचाने यूरिया, सूक्ष्म पोषक तत्व या कीटनाशक डालने से समस्या ठीक होने के बजाय बढ़ सकती है। इसलिए उपचार से पहले यह देखना जरूरी है कि पीलापन पुरानी पत्तियों में है या नई पत्तियों में, पूरे खेत में समान रूप से है या केवल कुछ स्थानों पर और पत्तियों पर धब्बे, धारियां अथवा कीट मौजूद हैं या नहीं।

Featured Image: हरे धान के बीच पीली पत्तियों का निरीक्षण करता किसान

धान की पत्तियां पीली होने पर सबसे पहले क्या जांचें?

खेत में जाकर निम्न पांच बातों का निरीक्षण करें:

  1. कौन-सी पत्तियां पीली हैं: पुरानी निचली पत्तियां या नई ऊपरी पत्तियां?
  2. पीलापन कहां है: पूरे खेत में समान रूप से या गोल और अनियमित टुकड़ों में?
  3. पत्तियों का स्वरूप: पूरी पत्ती पीली है या किनारे, नसों के बीच अथवा सिरे से पीलापन शुरू हुआ है?
  4. जड़ों की स्थिति: जड़ें सफेद और स्वस्थ हैं या काली, भूरी, सड़ी हुई और दुर्गंधयुक्त?
  5. कीट एवं रोग: पौधे के निचले हिस्से पर फुदके, पत्तियों पर धब्बे, पानी जैसे घाव या बौने पौधे तो नहीं हैं?

खेत के केवल किनारे देखकर निर्णय न लें। कम से कम पांच अलग-अलग स्थानों से पौधे निकालकर पत्तियों, तने और जड़ों की जांच करें। हाल ही में किए गए उर्वरक, खरपतवारनाशक या कीटनाशक प्रयोग का विवरण भी ध्यान में रखें।

लक्षण के आधार पर पीलापन पहचानने की आसान सूची
प्रमुख लक्षण संभावित कारण पहचान का संकेत
पुरानी निचली पत्तियां पहले पीली होना नाइट्रोजन की कमी हल्का हरा पौधा, कम कल्ले और धीमी बढ़वार
पौधे बौने, पत्तियों पर भूरे धब्बे या कांस्य रंग जिंक की कमी रोपाई के बाद खेत में असमान पीले-भूरे समूह
नई पत्तियां पीली लेकिन नसें अपेक्षाकृत हरी आयरन की कमी ऊंची, क्षारीय या खराब आयरन उपलब्धता वाली मिट्टी में अधिक संभावना
पुरानी पत्तियों के किनारे पीले-भूरे होकर सूखना पोटाश की कमी कमजोर तना, झुलसे जैसे किनारे और रोग के प्रति संवेदनशीलता
काली या भूरी जड़ें और पौधों की कमजोर बढ़वार जलभराव या जड़ संबंधी समस्या गहरा स्थिर पानी, खराब निकास अथवा जड़ों से दुर्गंध
नारंगी-पीले बौने पौधे छोटे समूहों में टुंग्रो रोग कम कल्ले, असमान ऊंचाई और हरे पत्ती फुदके की उपस्थिति
पत्ती के सिरे या किनारे से पीली-सफेद पट्टी बढ़ना जीवाणु पत्ती झुलसा लहरदार किनारे वाले घाव बाद में भूसे जैसे रंग के हो जाते हैं
गोलाकार क्षेत्र में पौधे नारंगी-पीले और बाद में सूखे भूरा फुदका पौधे के आधार पर कीट और हनीड्यू; गंभीर अवस्था में हॉपर बर्न
दवा डालने के कुछ दिन बाद एक समान पट्टियों में पीलापन खरपतवारनाशक की क्षति स्प्रे वाली दिशा में लक्षण, पत्ती जलना, मुड़ना या बढ़वार रुकना

1. नाइट्रोजन की कमी

धान में नाइट्रोजन की कमी होने पर सबसे पहले पुरानी और निचली पत्तियां हल्की हरी तथा बाद में पीली होने लगती हैं। पत्तियां छोटी और सीधी रह सकती हैं, कल्ले कम निकलते हैं तथा पौधे की बढ़वार धीमी हो जाती है। गंभीर कमी में पुरानी पत्तियां भूरे रंग की होकर सूख सकती हैं।

सही उपचार

  • मिट्टी जांच, लीफ कलर चार्ट और क्षेत्रीय सिफारिश के आधार पर ही नाइट्रोजन दें।
  • शेष अनुशंसित नाइट्रोजन को फसल की अवस्था के अनुसार विभाजित मात्रा में प्रयोग करें।
  • बहुत गहरे खड़े पानी में सीधे यूरिया डालने से बचें और स्थानीय जल-प्रबंधन सिफारिश अपनाएं।
  • यूरिया की मात्रा अपने अनुमान से बढ़ाना समाधान नहीं है; अधिक नाइट्रोजन कीट, रोग और पौधे गिरने का खतरा बढ़ा सकती है।

2. जिंक की कमी या खैरा रोग

जिंक की कमी धान में सामान्य रूप से “खैरा” के नाम से जानी जाती है। इसके लक्षण रोपाई के लगभग दो से चार सप्ताह बाद अधिक स्पष्ट हो सकते हैं। पौधों की बढ़वार रुक जाती है, कल्ले कम निकलते हैं और पत्तियों पर पीलेपन के साथ भूरे, जंग जैसे या कांस्य रंग के धब्बे बन सकते हैं।

जिंक की कमी पूरे खेत में समान न होकर छोटे-छोटे क्षेत्रों में अधिक दिखाई दे सकती है। क्षारीय मिट्टी, अधिक फॉस्फोरस, लंबे समय तक जलभराव और मिट्टी में कम उपलब्ध जिंक इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।

सही उपचार

  • मिट्टी या पौधे की जांच से जिंक की कमी की पुष्टि करें।
  • धान के लिए अनुशंसित जिंक सल्फेट को उसकी सांद्रता और स्थानीय कृषि विभाग की सिफारिश के अनुसार प्रयोग करें।
  • खड़ी फसल में कमी सुधारने के लिए उपयुक्त पर्णीय जिंक उत्पाद का प्रयोग लेबल के अनुसार किया जा सकता है।
  • जिंक उत्पाद की मात्रा उसके प्रतिशत और फॉर्मुलेशन के अनुसार बदलती है; सभी जिंक उत्पादों की मात्रा समान न रखें।
  • अगली फसल में मिट्टी जांच के आधार पर बेसल जिंक देकर समस्या की पुनरावृत्ति कम करें।

3. आयरन की कमी

आयरन की कमी में सामान्यतः नई और ऊपरी पत्तियां पहले पीली होती हैं, जबकि उनकी नसें कुछ समय तक अपेक्षाकृत हरी रह सकती हैं। समस्या बढ़ने पर नई पत्तियां लगभग पीली-सफेद दिखाई देने लगती हैं। यह लक्षण नाइट्रोजन की कमी से अलग है, क्योंकि नाइट्रोजन की कमी पुरानी पत्तियों से शुरू होती है।

सही उपचार

  • मिट्टी का पीएच और आयरन की उपलब्धता जांचें।
  • कृषि विशेषज्ञ की सलाह से धान के लिए उपयुक्त आयरन उत्पाद का पर्णीय प्रयोग करें।
  • क्षारीय मिट्टी में मिट्टी सुधार और जैविक पदार्थ बढ़ाने की दीर्घकालीन योजना अपनाएं।
  • आयरन की कमी समझकर बिना जांच के यूरिया या जिंक डालने से बचें।

4. पोटाश की कमी

पोटाश की कमी में पुरानी पत्तियों के सिरे और किनारे पहले पीले तथा बाद में भूरे होकर सूखने लगते हैं। पौधे कमजोर हो सकते हैं, तना गिरने की संभावना बढ़ सकती है और फसल रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती है।

सही उपचार

  • मिट्टी जांच और अनुशंसित पोषक प्रबंधन के अनुसार पोटाश दें।
  • पहले दिया गया पूरा पोटाश उपलब्ध है, ऐसा मानकर न चलें; हल्की मिट्टी में इसका नुकसान अधिक हो सकता है।
  • नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का संतुलन बनाए रखें।

5. अधिक पानी, खराब निकास और जड़ों की समस्या

धान पानी सहन करने वाली फसल है, लेकिन लगातार बहुत गहरा और स्थिर पानी जड़ों की कार्यक्षमता तथा पोषक तत्वों के अवशोषण को प्रभावित कर सकता है। हाल में लंबे समय तक डूबी फसल, खराब निकास, सड़ी जड़ें या मिट्टी में हानिकारक गैसें बनने से पौधे पीले और कमजोर हो सकते हैं।

प्रभावित पौधे को सावधानी से निकालें। स्वस्थ नई जड़ें सफेद या हल्के रंग की होती हैं। बहुत काली, सड़ी हुई और दुर्गंधयुक्त जड़ें जड़ क्षेत्र की समस्या का संकेत हो सकती हैं।

सही उपचार

  • खेत से अतिरिक्त पानी निकालने के लिए निकास नालियां खोलें।
  • फसल की अवस्था और स्थानीय पद्धति के अनुसार उथले पानी या नियंत्रित सिंचाई की व्यवस्था रखें।
  • पानी निकलने और जड़ों की स्थिति सुधरने के बाद ही उर्वरक देने का निर्णय लें।
  • बाढ़ या लंबे जलभराव के तुरंत बाद अधिक मात्रा में उर्वरक न डालें।

6. टुंग्रो रोग

टुंग्रो एक विषाणुजनित रोग है, जिसे मुख्य रूप से हरा पत्ती फुदका फैलाता है। प्रभावित पौधे पीले से नारंगी-पीले, बौने और कम कल्ले वाले दिखाई देते हैं। पत्तियों का रंग सिरे से नीचे की ओर बदल सकता है। रोग अक्सर खेत में असमान समूहों से शुरू होता है, इसलिए इसे पोषक तत्व की कमी समझने की गलती हो सकती है।

सही प्रबंधन

  • विषाणु से संक्रमित पौधे को किसी उर्वरक या फफूंदनाशक से ठीक नहीं किया जा सकता।
  • शुरुआती अवस्था में रोगग्रस्त पौधों को जड़ सहित निकालकर सुरक्षित तरीके से नष्ट करें।
  • खेत और मेड़ों से रोग एवं फुदके को आश्रय देने वाले खरपतवार हटाएं।
  • हरे पत्ती फुदके की नियमित निगरानी करें और आवश्यकता होने पर केवल पंजीकृत उत्पाद लेबल के अनुसार प्रयोग करें।
  • अगली फसल के लिए क्षेत्र में अनुशंसित प्रतिरोधी या सहनशील किस्म और स्वस्थ पौध अपनाएं।

7. जीवाणु पत्ती झुलसा

जीवाणु पत्ती झुलसा में पत्ती के सिरे या किनारे पर पानी जैसे घाव बन सकते हैं। ये घाव आगे बढ़ते हुए पीले, सफेद या भूसे जैसे रंग के हो जाते हैं। घाव के किनारे अक्सर लहरदार दिखाई देते हैं। अधिक नाइट्रोजन, तेज हवा, लगातार बारिश और पत्तियों पर चोट से रोग बढ़ सकता है।

सही प्रबंधन

  • अधिक यूरिया देना बंद करें और संतुलित पोषण बनाए रखें।
  • रोगग्रस्त खेत से स्वस्थ खेत में काम करते समय औजार और गतिविधियों का ध्यान रखें।
  • रोग बढ़ने की परिस्थिति में अनावश्यक रूप से पत्तियां काटने या पौधों को चोट पहुंचाने से बचें।
  • अगली फसल में स्वस्थ बीज और क्षेत्र के लिए अनुशंसित प्रतिरोधी किस्म का चयन करें।
  • किसी भी जीवाणुनाशक या अन्य उत्पाद का प्रयोग केवल स्थानीय कृषि विशेषज्ञ और स्वीकृत लेबल के अनुसार करें।

8. भूरा फुदका और हॉपर बर्न

भूरा फुदका पौधे के निचले हिस्से पर रहकर रस चूसता है। अधिक संख्या होने पर पौधे पहले नारंगी-पीले और बाद में भूरे होकर सूख जाते हैं। यह नुकसान सामान्यतः खेत में गोलाकार टुकड़ों में दिखाई देता है और इसे हॉपर बर्न कहा जाता है।

पौधों को हल्का झुकाकर तने के आधार पर छोटे भूरे फुदकों और उनके बच्चों की जांच करें। अत्यधिक यूरिया और बिना आवश्यकता व्यापक प्रभाव वाले कीटनाशकों का प्रयोग इस कीट की समस्या बढ़ा सकता है।

सही प्रबंधन

  • पौधे के आधार पर कीट की संख्या देखकर ही नियंत्रण का निर्णय लें।
  • अधिक प्रकोप वाले खेत में संभव होने पर कुछ समय के लिए अतिरिक्त पानी निकालें।
  • यूरिया की अगली मात्रा को रोककर फसल की स्थिति का निरीक्षण करें।
  • आर्थिक क्षति स्तर पार होने पर धान और भूरा फुदका के लिए पंजीकृत उत्पाद लेबल के अनुसार प्रयोग करें।
  • स्प्रे को केवल ऊपर की पत्तियों पर न छोड़ें; उत्पाद के निर्देश के अनुसार पौधे के निचले हिस्से तक पहुंचाएं।

9. खरपतवारनाशक या अन्य रसायन से नुकसान

गलत मात्रा, गलत समय, दूषित स्प्रे पंप, दो उत्पादों का अनुचित मिश्रण या पास के खेत से स्प्रे बहकर आने के कारण धान की पत्तियां पीली, सफेद, जली हुई या मुड़ी हुई दिखाई दे सकती हैं। इसके लक्षण अक्सर स्प्रे की दिशा, पहिए के निशान या खेत की विशेष पट्टियों में अधिक होते हैं।

सही उपचार

  • संदिग्ध रसायन का दोबारा प्रयोग तुरंत रोकें और उसका लेबल जांचें।
  • खेत में अत्यधिक रसायन पहुंचा हो तो फसल और उत्पाद के अनुसार कृषि विशेषज्ञ से जल-प्रबंधन की सलाह लें।
  • तनावग्रस्त फसल पर तुरंत कई पोषक तत्व, टॉनिक और कीटनाशक मिलाकर न छिड़कें।
  • स्प्रे की तारीख, उत्पाद, मात्रा, पानी और प्रभावित क्षेत्र की जानकारी लिखकर रखें।
  • गंभीर नुकसान में नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि अधिकारी को नमूना दिखाएं।

धान के पीलेपन के उपचार की चरणबद्ध रणनीति

  1. पूरे खेत में पीलापन फैलने का तरीका देखें और प्रभावित स्थान चिह्नित करें।
  2. पुरानी तथा नई पत्तियों के लक्षण अलग-अलग जांचें।
  3. एक प्रभावित पौधा निकालकर जड़ों और तने का निरीक्षण करें।
  4. पौधे के आधार पर फुदके और पत्तियों पर रोग के घाव देखें।
  5. पिछले सात से दस दिनों में दिए गए उर्वरक और रसायनों का रिकॉर्ड जांचें।
  6. संभावित कारण की पुष्टि मिट्टी, पानी या पौधा जांच से करें।
  7. केवल उसी कारण के अनुसार पोषक तत्व, जल प्रबंधन या फसल सुरक्षा उपाय अपनाएं।
  8. उपचार के पांच से सात दिन बाद नई पत्तियों और बढ़वार का दोबारा निरीक्षण करें।

किसान अक्सर कौन-सी गलतियां करते हैं?

  • हर प्रकार के पीलेपन को नाइट्रोजन की कमी समझकर यूरिया डालना।
  • मिट्टी जांच के बिना एक साथ जिंक, आयरन और दूसरे सूक्ष्म पोषक तत्व देना।
  • टुंग्रो जैसे विषाणु रोग पर फफूंदनाशक का प्रयोग करना।
  • भूरे फुदके को देखे बिना बार-बार कीटनाशक छिड़कना।
  • जलभराव वाली कमजोर फसल में तुरंत अधिक उर्वरक डालना।
  • अलग-अलग फॉर्मुलेशन वाले जिंक उत्पादों की मात्रा समान रखना।
  • खरपतवारनाशक की क्षति को रोग समझकर कई रसायन मिला देना।
  • केवल पीली पत्ती देखकर निर्णय लेना और जड़ों की जांच न करना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धान पीला होने पर क्या तुरंत यूरिया डालना चाहिए?

नहीं। यूरिया केवल नाइट्रोजन की पुष्टि होने पर देना चाहिए। जिंक की कमी, टुंग्रो, भूरा फुदका, जलभराव या खरपतवारनाशक की क्षति में अतिरिक्त यूरिया समस्या बढ़ा सकता है।

नाइट्रोजन और जिंक की कमी में क्या अंतर है?

नाइट्रोजन की कमी सामान्यतः पुरानी निचली पत्तियों के एक समान पीलेपन, कम कल्लों और हल्के हरे पौधों के रूप में दिखाई देती है। जिंक की कमी में पौधे बौने रह सकते हैं तथा पत्तियों पर पीलेपन के साथ भूरे या कांस्य रंग के धब्बे दिखाई दे सकते हैं।

क्या पूरी तरह पीली पत्ती दोबारा हरी हो जाएगी?

गंभीर रूप से पीली या सूख चुकी पुरानी पत्ती पूरी तरह हरी नहीं भी हो सकती। सही उपचार की सफलता नई निकलने वाली पत्तियों, नई जड़ों, कल्लों और पौधे की बढ़वार में सुधार देखकर जांचें।

धान में जिंक की कितनी मात्रा डालनी चाहिए?

मात्रा जिंक सल्फेट के प्रकार, उसमें मौजूद जिंक प्रतिशत, मिट्टी की स्थिति और राज्य की सिफारिश पर निर्भर करती है। उत्पाद का प्रतिशत देखे बिना सामान्य मात्रा न अपनाएं। मिट्टी जांच और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता दें।

धान में पीलेपन के साथ पत्तियां सूख रही हों तो क्या करें?

पत्ती सूखने का तरीका देखें। किनारे से सूखना पोटाश की कमी, सिरे से बढ़ता पीला-सफेद घाव जीवाणु झुलसा और गोलाकार क्षेत्र में पौधों का सूखना भूरा फुदका हो सकता है। उपचार से पहले सही पहचान आवश्यक है।

निष्कर्ष

धान की पत्तियों का पीलापन अपने आप में कोई एक रोग नहीं, बल्कि फसल में मौजूद समस्या का लक्षण है। पुरानी पत्तियों का समान पीलापन नाइट्रोजन की कमी, भूरे धब्बों के साथ बौने पौधे जिंक की कमी और छोटे समूहों में नारंगी-पीले पौधे टुंग्रो या फुदके की ओर संकेत कर सकते हैं।

पत्तियों के साथ जड़, तना, खेत में पानी और कीटों की जांच करके ही उपचार चुनें। सही पहचान, मिट्टी जांच, संतुलित पोषण और नियमित निगरानी से अनावश्यक उर्वरक एवं कीटनाशक खर्च को कम करते हुए फसल को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है।